खाने की बहुत शौकीन हैं मेघा गुप्ता!

ज़्यादातर लोगों के लिए ऐक्टर की जिंदगी का मतलब होता है पैसा, शोहरत और फिटनेस, लेकिन लोग ये नहीं जानते हैं कि कुछ ऐक्टर खाने के बहुत ज़्यादा शौकीन होते हैं और खाने का कोई भी मौक़ा हाथ से जाने नहीं देते। ऐसी ही एक ऐक्ट्रेस हैं मेघा गुप्ता, जो ’स्टार भारत (लाइफ ओके: रीब्रांडेड) की प्रतिशोध

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हे राम … सुनकर रो दिए अपारशक्ति खुराना

’स्टार भारत’ के धार्मिक गीतों पर आधारित रियलिटी शो ’ओम् शांति ओम्’ में कई ऐसे प्रसंग आ रहे हैं, जो प्रतियोगियों, जजों की और यहाँ तक कि होस्ट तक की आत्मा को झकझोर देते हैं। धर्म के प्रति लोगों की आस्था और विश्वास भी यहाँ खुलकर सामने आ रहा है। ऐसी ही एक घटना तब

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बरसात #Poetry

लटें भींगी                                       तन भी भींगा आनंद ले रहे थे कपङे उनके तन के जो चिपकी जा रही थी आनंदित हो आहलाहित हो उनके तन के खुश्बू से।। मैं भी कहाँ शरीफ? खिङकियों के ओट से नजर टिकी थी मेरी उन पर

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ख्वाहिस बस इत्ती सी

तेरे आने के खुशी में पलकें भींगी मेरी थाम न पाया आँसूओं का सैलाब जब होने लगी तू रूखसत।। रोक न पाया तुझे क्योंकि तू अमानत थी किसी और की।। खिलते थे गुलिस्तां मेरे मन के बगिया में पर, तेरी जङे थी किसी और के मल्कियत में।। ख्वाहिस बस इत्ती सी रहे जहाँ भी झूमती

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बातें

बीती बातों का है अंबार इजहार करने को मन है तैयार पर किस छोर से शुरू करें किस डोर को ढीली करें समझ न पायें हम।। विराम दिया, कुछ क्षण लेखनी को लगाम दिया मन के आवेगों को व्याकुलता तो है बहुत उमंगो को रंग दें पर किसमे कितना रंग भरें तय कर पाना है

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जीने की सबब

दबे पाँव, वे मेरे ख्बाबों में आए, खुशनुमा हो गई, जिंदगी मेरी, जीने की सबब, जो मिल गई मुझे।। © इला वर्मा 06-05-2016

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हर एक फ्रेन्ड जरूरी होता है

हर एक फ्रेन्ड जरूरी होता है जिंदगी के हर डगर पर मिलते हैं दोस्त अनेक दोस्तों की महफिल जमती तो, काफूर हो जाते सब गम बिन्दास हो, गाना-बजाना करते हम चेहरे से गायब हो जाती, शिकन हर छोटी मोटी बातों पर लोट-पोट हो हंसी-ठिठोली लगाते हम।। हम हैं, गुलदस्ते के रंग-बिरंगे फूल, संग मिलकर खूबसूरत

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कोई लौटा दे मुझे मेरा बीता बचपन

SOURCE: here जब हम बच्चे थे अक्ल के कच्चे थे हमारे मन सच्चे थे ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं द्वेष और भेदभाव से परे।। अपनी इक छोटी सी दुनिया जो सजती गुङिया-गुड्डों, रंग-बिरंगे खिलौने से जिनमें बसती थी जान हमारी।। सज-संवर कर रंग-बिरंगे कपङों में माँ की ऊँगली पकङ कर जाते हम स्कुल ज्योंहि माँ ऊँगली

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मिलेगें हम एक बार

रूबरू हुए हम बीते पल से सजते थे महफिल हमारे दम पर।। समय के चक्रवात ने कर दिया चकनाचूर संजोए उम्मीद सारे।। दफन हो गये सब ख्बाब हमारे रह गए सिर्फ अवसाद हमारे।। एक आस है बाकि कभी तो, कहीं तो मिलेगें हम एक बार।।  © इला वर्मा 19-01-2016

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