Sunday, June 26, 2016

बरसात



लटें भींगी                                      
तन भी भींगा
आनंद ले रहे थे
कपङे उनके तन के
जो चिपकी जा रही थी
आनंदित हो
आहलाहित हो
उनके तन के खुश्बू से।।


मैं भी कहाँ शरीफ?
खिङकियों के ओट से
नजर टिकी थी मेरी
उन पर
जिनकी हर कोशिश
अपने आप को सिमटने की 
हो रही थी नाकाम।।


हाथ में लिए
दो प्याली चाय
करी हमने मिन्नतें बहुत
पी ले, हमारी हाथों की चाय
ठण्ड छू मंतर हो जायेगा
तन में काबू जाएगा।।

© इला वर्मा 26-06-2016

‘This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.’



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