Tuesday, January 13, 2015

इंसान की पहचान



ख्बाबों में तुम्हे पास पाया 

सोचा था साथ चलोगे मीलों 

कसमें भी खाई थी संग छोङगें ना कभी 

मैं भी इतरायी तुम्हारी बातों पर

खुद को खुशकिस्मत समझती

गम से बहुत दूर अपने आशयाने में 

ख्बाबों को पिरोया सजाया

खूब इठलाती मन ही मन



पर जब सहारा माँगा 

तुम्हारे हाथों का

झटक कर बढ गये आगे

ठगी सी देखती रही

बुत सी बेजान सी

जुबां कुछ नहीं कह पायी

पर अंदर से खोखली पायी

कसमें देने आसां हैं

पर कौन है हमसफर

यह समय ही तय कर पाता है

इंसान की पहचान भी समय ही कराती है।।


 ----- इला 


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